पूर्व मुख्य न्यायाधीश DY चंद्रचूड ने हाल ही में दिए गए अपने बयान को लेकर उठी विवादास्पद टिप्पणियों पर सफाई दी। चंद्रचूड ने कहा था कि "बाबरी मस्जिद का निर्माण मूल रूप से अपवित्रता की एक क्रिया थी," जिसे सोशल मीडिया पर गलत संदर्भ में पेश किया गया। इस टिप्पणी के कारण उनके विचारों को आयोध्या विवाद पर उनके दृष्टिकोण के रूप में गलत समझा गया।
मुंबई में आयोजित मीडिया वार्तालाभ में चंद्रचूड ने स्पष्ट किया कि उनके साक्षात्कार के अंश को सोशल मीडिया पर चुनिंदा तरीके से उद्धृत किया गया, जिससे उनका मूल संदेश विकृत हो गया। उन्होंने यह भी जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का आयोध्या फैसला प्रमाण और कानूनी सिद्धांतों पर आधारित था, न कि किसी धार्मिक विश्वास पर।
DY चंद्रचूड ने बताया कि इस फैसले के लिए 30,000 से अधिक पृष्ठों का केस रिकॉर्ड और सबूतों की गहन समीक्षा की गई थी। उन्होंने सोशल मीडिया पर न्यायिक स्वतंत्रता के प्रति बढ़ती धारणाओं पर चिंता व्यक्त की, जहां जजों को उनके फैसलों के आधार पर या तो सरकार समर्थक या सरकार विरोधी के रूप में देखा जाता है।
चंद्रचूड का यह स्पष्टिकरण इस गलतफहमी को दूर करने और सुप्रीम कोर्ट के आयोध्या फैसले की वैधता और निष्पक्षता को दोबारा रेखांकित करने के लिए है। उनका मानना है कि न्यायपालिका के फैसलों को समझने और सम्मान देने के लिए सही संदर्भ और प्रमाण का ध्यान रखना आवश्यक है।
इस मामले में DY चंद्रचूड ने यह संदेश भी दिया कि सोशल मीडिया पर उद्धरण और अंशों के गलत प्रयोग से न केवल न्यायपालिका की छवि प्रभावित हो सकती है, बल्कि सार्वजनिक धारणा भी विकृत हो सकती है। उन्होंने नागरिकों और मीडिया से आग्रह किया कि न्यायिक टिप्पणियों को हमेशा पूरे संदर्भ में समझें और फैलाएं।
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